
*मानस के कुछ मनोहारी प्रसंग-167*
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_(रामकथा सब विधि सुखदायी )_
*चरण कमल रज कहुँ सब कहई।*
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भगवान् श्रीराम की चरणरज: मनुष्यता के निर्माण की महौषधि
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भूमिका- मानस का मूल प्रतिपाद्य श्री राम के श्रीचरणों में अनन्य भक्ति है।इस सिद्धांत को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में केवट प्रसंग की महनीय भूमिका है।केवट श्रीराम-चरणों का अनन्य दास है।इस पूरे प्रसंग में केवट की दृष्टि श्रीराम के श्रीचरणों पर ही टिकी रहती है।ऐसा प्रतीत होता है कि सचमुच केवट को उस दिव्य श्रीचरणों का मर्म ज्ञात है।
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केवट-प्रसंग “मागी” शब्द से आरंभ होता है।वह भी संपूर्ण संसार को देनेवाला आज केवट से माँग रहा है।श्री राम के चरित्र का यह अद्भुत पक्ष है कि महाराज मनु से माँगने कहते हैं(सकुच बिहाइ मागु नृप मोही) और दीन केवट से माँगते हैं(मागी नाव न केवट आना)।जो महाराज मनु मंगन को जीवन भर देते रहे, आज वे माँग रहे हैं और जो केवट जीवन भर माँगते रहे,आज उससे माँगा जा रहा है।ये हैं गोस्वामी तुलसीदास जी के दीनदयालु, दीनानाथ भगवान् श्रीराम।
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केवट प्रसंग गोस्वामी जी का अपना प्रसंग है, जहाँ वे अपने मनोभावों को खुलकर अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।तुलसी के श्रीराम पतिता अहल्या का उद्धार करते हैं।इससे उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष उजागर होता है,जो समाज को नारी के प्रति एक विशेष दृष्टि प्रदान करता है।आज भी नारी समस्या के बाद जो समस्या सबसे अधिक जीवंत और समीचीन है, वह है समाज के दलितों, पतितों और उपेक्षितों की समस्या।केवट प्रसंग इसी से संबद्ध है।परंतु गोस्वामी जी ने इसे भक्त्यात्मक रुप प्रदान कर संकीर्णता से ऊपर उठकर विचार करने के लिए आग्रह किया है।
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प्रसंग-श्री राम ने जबर्दस्ती सुमंत्र को वापस किया और गंगा जी के तीर पर आये। रथ के घोड़े राम के बिना व्याकुल हैं।वे राम को देख-देखकर हिनहिना रहे हैं।गोस्वामी जी कहते हैं कि जब पशुओं की ऐसी दशा है तो प्रजा, माता और पिता कैसे जीवित रहेंगे?यह सहज विचारणीय है।
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भगवान् श्रीराम गंगा-घाट पर आये। उन्होंने पार करने के लिए केवट से नाव माँगी, परन्तु केवट नहीं आया।यहाँ केवट ने एक बड़ी बात कही कि मैं आप के मर्म को जानता हूँ।आपके चरणकमलों की धूल के लिए सब कोई ऐसा कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।केवट कहता है-
*चरन कमल रज कहुँ सब कहई।मानुष करनि मूरी कछु अहई।।(2/100/4)*
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व्याख्या- भगवान् श्री राम बलात् सुमंत्र को वापस भेजकर अत्यंत दु:खी हैं।अभी तक का प्रसंग(अयोध्या से लेकर यहाँ तक) कुटिलता, द्वेष, दंभ, असत्य, छल और कपट के दलदल से परिपूर्ण है, जिसे पार करते हुए श्री राम यहाँ तक आये।गोस्वामी जी स्वयं ऐसे प्रसंगों से मानो आहत हैं।अतः केवट-प्रसंग के बहाने वे हास्य और प्रेमभक्तिरसों की सुरसरिता प्रवाहित करना चाहते हैं।
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यह स्पष्ट है कि इस प्रसंग में निषादराज केवट नहीं हैं।केवट के बहाने गोस्वामी जी “सहज प्रेम” को पारिभाषित करना चाहते हैं।इसके साथ ही उनकी चरण-धूलि की महिमा को प्रतिस्थापित करते हैं।यह अहल्या प्रसंग का प्रभाव है कि केवट कहता है कि आपकी चरण-धूलि एक चमात्कारिक जड़ी है, जो किसी भी जड़ को भी मनुष्य बना देती है।तात्पर्य यह कि चरण की धूल ऐसी है तो वह चरण कितना चमत्कारिक होगा।
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यहाँ इस पद की व्यंजना विशेष रूप से ध्यातव्य है।केवट कहता है कि संसार में सभी कहते हैं कि आपकी चरणधूलि में मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है।यह अहल्या प्रसंग से संबद्ध है।यह सच भी है कि उनका कलुष-कल्मष संपूर्णतः धुल गया।पाषाणी अहल्या पूर्ण सचेतन नारी में परिवर्तित हो गयी।इस परिवर्तन में भगवान् श्रीराम की चरनरज की महनीय भूमिका है।केवट के इस कथन का यहाँ एक दूसरा सकारात्मक विशेषार्थ है कि जो मनुष्य योनि में आकर मनुष्य नहीं बन पाया है।अर्थात् उसका आचार, विचार, व्यवहार और संस्कार मानवीय नहीं है।वह आपके श्रीचरणों के प्रभाव से सर्वांग रूप से मनुष्यता ग्रहण कर लेता है। *मूरि* का सामान्य अर्थ मूल, जड़ी, बूटी आदि है।इसका तात्पर्य यह है कि आपकी चरणरज महौषधि है।वह जीवन को पाप, ताप, संताप आदि समस्त रोगों से मुक्त कर देती है।उसका जीवन अंतर्बाह्य संपूर्ण मनुष्यता को ग्रहण कर कृतार्थ हो जाता है।
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चरन कमल रज कहकर उस चरण की कोमलता की ओर भी संकेत है। केवट की दृष्टि उसी चरण कमल पर है और उसके पराग यानी रजकण पर है।
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इस छोटे से प्रसंग में दस बार चरणों का विभिन्न पर्याय प्रयुक्त हुए हैं।केवट का सहज चरण-प्रेम इसी से समझा जा सकता है।इसके मर्म शिव विरंचि नहीं जानते,उस चरणों के मर्म को एक केवट जानता है-यही सबसे बड़ा मर्म है। एतदर्थ केवट कहता है- चरन कमल रज कहुँ सब कहई।मानुष करनि मूरी कछु अहई।। (क्रमशः)
जय जय
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**मानस के कुछ मनोहारी प्रसंग-169*
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_(रामकथा सब विधि सुखदायी )_
*पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं |*
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केवट : प्रभु के चरणकमलों को धोकर नाव पर चढ़ाने का निष्काम आग्रही
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भूमिका- गोस्वामी तुलसीदास मध्यकाल के एक क्रांतिकारी संत हैं, जिन्होंने परंपरा के साथ चलकर भी एक सर्वयुगीन राजपथ का निर्माण किया। इसके लिए उन्होंने श्री राम को चुना और उस श्रीराम के चरित को जन-जन के मानस में बसा दिया। वह रामचरितमानस आज झोपड़ी से लेकर राजमहल तक स्थापित है।
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परंपरापोषक तुलसी धर्मांध और अंधविश्वासी नहीं हैं।परंपरा में कबीर आदि संतों ने ब्राह्मणों का विरोध किया और अलग ढंग की बात कही, जो निश्चितरूप से सर्वग्राह्य नहीं थी।उन्होंने सबको खरी-खोटी सुनाई।इससे उलट तुलसी ने ब्राह्मणों की प्रशंसा की, परन्तु उसी समाज में निषादराज, केवट, शबरी आदि को उच्च स्थान दिया।तुलसी के सामने समाज है और उसमें रहने वाला मनुष्य है।वे सर्वहित के भाव से जीते हैं और लिखते हैं- “सुरसरि सम सब कर हित होई।”
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ऐसा ही उनका मानस था, जो उन्होंने मानस में लिखा।गंगा किसी जाति वर्ण को नहीं जानती, वह तो सबके लिए अविरल बहती रहती है।इसीलिये मानस के अंत में वे कहते हैं कि जो मनुष्य इस मानस में प्रेमपूर्वक अवगाहन करते हैं, वे संसार रुपी सूर्य की अति प्रचंड किरणों से नहीं जलते-श्रीरामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगहन्ति ये।ते संसारपतंगघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवा:।। (उत्तरकांड, समापन श्लोक-2) यहाँ प्रयुक्त “मानव” ही पूरे मानस का केंद्र है।यही हेतु है कि कबीर जिस निराकार को रुप देने में परहेज करते रहे; तुलसी ने उस निराकार को नराकार (मानवाकार) बना दिया।यही “मानव” तुलसी का प्रतिपाद्य है।
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प्रसंग- केवट भगवान् श्री राम से कहते हैं-हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता-
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। 2/100/छंद1
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व्याख्या- मानस का केवट बड़ा ही निर्भीक, साहसी और स्वाभिमानी है।ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान् श्रीराम को देखकर ही उसका अंतर्बाह्य सहजता से परिपूर्ण हो गया।उनकी उपस्थिति मात्र से केवट धन्य-धन्य हो गया है। मानस का केवट श्रीराम का सबसे बड़ा दुलरुआ है।वह बार-बार एक ही आग्रह करता है-पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव……। उसका सर्वस्व रामचरण है।उसे अपनी उतराई की भी चिंता नहीं है।इसीलिए तो अंत में उसने कहा कि “नाथ आज मैं काह न पावा।”
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केवट ने कहा महाराज अब मैं उतराई लेकर क्या करूँगा! “आपने मुझे जितना बड़ा बना दिया है, अब देकर छोटा मत बनाइये।भगवान् ने कहा-क्यों?केवट ने कहा-“महाराज! संसार के सभी लोग मुझे दरिद्र कहते हैं, दीन-हीन कहते हैं, तुच्छ कहते हैं।तो आप अगर गंगा के किनारे आते और खड़े होकर कहते कि तू तो बड़ा दरिद्र है! जो माँगना है माँग ले! तो मैं समझ लेता कि मैं दरिद्र हूँ और आप देनेवाले हैं।लेकिन, जब आप गंगा के किनारे खड़े हुए और आपने आकर के कहा कि केवट मुझे नाव चाहिए।तो प्रभु !मैं गदगद हो गया कि अरे मैं दरिद्र कैसे हूँ? जब सारे संसार को देनेवाला ही माँग रहा है तो मैं दरिद्र नहीं हूँ।”(रामकिंकर जी महाराज)
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इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि केवट एक ऐसा पात्र है जो राम के दर्शनोपरांत भय और लोभ से मुक्त हो गया है।परंतु उसे वह चाहिए जिसके लिए योगी ,ऋषि ललायित हैं -श्री राम का चरणामृत।इसलिए वह कहता है-पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। (क्रमशः)
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*मानस के कुछ मनोहारी प्रसंग-170*
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_(रामकथा सब विधि सुखदायी )_
*बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।*
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चरणामृत के लिए केवट का प्राण-परिक्रय
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भूमिका- गोस्वामी तुलसीदास की संघर्षशीलता और क्रांतिकारिता असाधारण और अद्भुत है।तभी तो उनके मानस का एक लघु पात्र केवट इतना निर्भीक है कि जिस लक्ष्मण जी के सम्मुख मानस के बड़े-बड़े पात्र मौन होने में ही अपनी भलाई देखते हैं, वैसे दुर्धर्ष लक्ष्मण जी के सम्मुख तुलसी का केवट कहता है-
बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।(2/100 छंद)
यह है केवट की निर्भीकता।इस निर्भीकता के दो कारण हैं।एक निर्लोभी व्यक्ति ही निर्भय हो सकता है।दूसरा, केवट देख रहा है कि “सारे संसार को पार उतारने वाला जब मुझसे पार उतारने को कह रहा है तो महाराज फिर डर कैसा?”क्योंकि केवट की यह निर्भीकता प्रुभु के नाव माँगते ही प्रकट हो गई।केवट नाव माँगने पर भी नहीं आया-मागी नाव न केवट आना। उसी समय लक्ष्मण जी ने सोचा हम सभी भाई- *प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं।कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।* )7/25/2) और यह केवट ऐसी ढिठाई कर रहा है।उन्हें लगा कि यह सब कुछ अज्ञानता में कर रहा है।परंतु अगले ही क्षण केवट ने कहा-कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।(2/100/3) तो लक्ष्मण जी चकित रह गये।
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बात भी सच है।महर्षि वाल्मीकि ने कहा है- *जगु पेखन तुम देखनिहारे।बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।तेउ न जानहिं मरम तुम्हारा।औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।*(1/127/1-2) और केवट इस मर्म को जानता है।अतः स्पष्ट है कि केवट सच में पारखी है।उसकी यह निर्भयता “अज्ञानजन्य” नहीं, “ज्ञानजन्य” है। वह बाहर से दरिद्र है, लेकिन मन से नहीं।अतः मर्म को जानता है।परंतु मानस का रावण बाहर से भले ही दरिद्र न हो, उसके मन में, उसके विचार में दरिद्रता विद्यमान है, अतः जीवन के अंत तक श्रीराम को नहीं पहचान पाया।
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इस प्रकार तुलसीदास ने केवट चरित के माध्यम से एक युगीन भक्त्यात्मक क्रांति को जन्म दिया, जो आजतक जीवित है।नागरी-प्रचारिणी सभा, वाराणसी से प्रकाशित ‘तुलसी-ग्रंथावली’ (तृतीय खंड, मूल्यांकन) में डॉ रामजी राय ने तुलसी का सम्यक् मूल्यांकन करते हुए लिखा है- ” तुलसीदास अपने समय के सबसे अधिक उपेक्षित, संघर्षी और साहसी व्यक्ति थे।उपेक्षित इसलिए कि वे बचपन से ही वर्तमानजीवी बने रहे, अभागे बनकर भटकते रहे और एक-एक दिन कष्ट में काटते रहे।…..संघर्षी इसलिए कि तुलसीदास को व्यक्ति और समाज दोनों स्तर पर जूझना पड़ा।…..साहसी इसलिए कि उन्होंने समाज की चुनौती स्वीकार की।ऐसे बीहड़ कवि का मूल्यांकन करने से पहले हमें सोच लेना चाहिए कि हम एक अत्यंत विवादास्पद कवि का मूल्यांकन कर रहे हैं।और, यह कवि आज भी हिंदी का सबसे बड़ा, सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली कवि है।”
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यही कारण है कि परंपरा से प्राप्त केवट-चरित को गोस्वामी तुलसीदास ने एक महत्तम सामाजिक चरित प्रदान किया। इसके पीछे कारण यह है कि तुलसीदास और राम का चरित भले ही विवादास्पद हो ,परंतु संदेहास्पद नहीं है।
तुलसीदास की इसी सैद्धांतिक दृढ़ता ने रामकथा को गौरीशंकर की महत्तम ऊंचाई प्रदान की और समाज का केवट भी निर्भीक हो गया।मानो रामराज्य की नींव इसी भागीरथी के तट पर पड़ी और केवट उसके पुरस्कर्ता बने।
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प्रसंग- केवट श्रीराम से कहता है कि हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं सब सच- सच कहता हूँ।लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तबतक हे तुलसीदास के नाथ!हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा-
*बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। 2/100 छंद*
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व्याख्या- केवट यहाँ श्री राम और महाराज दशरथ की शपथ लेकर कह रहा है।इसकी व्यंजना यह है कि जैसे आप दोनों पिता-पुत्र सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़व्रत हैं, वैसा ही मैं भी हूँ, जो कह रहा हूँ वही करूँगा।भले ही लक्ष्मण जी बाण चला दें।केवट की यह दृढ़ता अद्भुत है,जो चरणामृत की प्राप्ति के लिए प्राण-परिक्रय के लिए तैयार है।
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श्रीराम उनकी इस अटपटी वाणी को सुनकर सीता जी और लक्ष्मण जी की ओर देखकर हँसे कि भक्त तो मुझे बहुत मिला,पर ऐसा अटपटा भक्त कोई नहीं मिला।
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अयोध्या में राजरस भंग होने के बाद आज पहली बार गंगा तट पर भगवान् श्री राम केवट की अटपटी वाणी सुनकर हँसे। गोस्वामीजी कवितावली में इस प्रसंग को और मधुरता से व्यक्त करते हैं-
पावन पाय पखारि कै नाव चढ़ाइहौं, आयसु होत कहा है।
तुलसी सुनि केवटके बर बैन हँसे प्रभु जानकी ओर हहा है।।2/7
तुलसी के राम केवट के इस निश्छल प्रेम को अंतर्मन से पहचानते हैं और हहाकर हँसते हैं।ऐसा वर्णन अन्यत्र नहीं मिलता।
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भगवान् भक्त के पराधीन होते हैं।श्री राम आज केवट के प्रेम को पहचान कर अभिभूत हो गये। उन्होंने केवट से कहा कि वही करो जिससे तुम्हारी नाव सुरक्षित रहे।मेरे पद को पखारकर यथाशीघ्र पार करो।भगवान् श्रीराम केवट के आंतरिक भाव को समझकर कृपा कर रहे हैं और कह रहे हैं-बेगि आनु जल पाय पखारू। (2/101/2) परंतु इस आज्ञा के मूल में निर्भीक और आग्रही केेेवट का यह कथन है-बरु तीर मारहुँ लखन पै जब लगि न पाय पखारिहौं। (क्रमशः)
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